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''हम परमाणु परीक्षण का अधिकार रखते हैं''

विएना में भारत की सफलता के बाद भारत-अमेरिका परमाणु समझौते में मुख्य भूमिका निभाने वाले विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने प्रबंध संपादक राज चेंगप्पा और सीनियर एडीटर सौरभ शुक्ला से भारत के परमाणु भविष्य पर बात की. उसके अंशः

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पैंतालीस सदस्यीय न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसजी) ने भारत के साथ असैनिक परमाणु व्यापार की इजाजत देने के लिए अपने नियमों में सुधार किया. इस तरह 1974 में भारत के परमाणु परीक्षण के बाद उसके साथ 34 साल से चला आ रहा परमाणु भेदभाव खत्म हुआ. विएना में भारत की सफलता के बाद भारत-अमेरिका परमाणु समझौते में मुख्य भूमिका निभाने वाले विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने प्रबंध संपादक राज चेंगप्पा और सीनियर एडीटर सौरभ शुक्ला से भारत के परमाणु भविष्य पर बात की. उसके अंशः

न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप का प्रतिबंध हटाना कितना महत्वपूर्ण है?
यह हमारे परमाणु अस्पृश्यता के दौर का अंत है. 1974 के परमाणु परीक्षण के बाद हमने कड़े प्रतिबंधों का सामना किया. हमारे परमाणु वैज्ञानिकों को अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में भाग लेने की इजाजत भी नहीं थी. एनएसजी के प्रतिबंध हटने से हमें दूसरे देशों के साथ असैनिक परमाणु व्यापार करने का पासपोर्ट मिल गया है. यह भारत की खास अहमियत और परमाणु अप्रसार के मामले में उसके साफ-सुथरे रिकॉर्ड का स्वीकार है. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को पूरा भरोसा है कि यह असैनिक परमाणु सहयोग भारत के लिए अच्छा है और दुनिया के लिए भी.

क्या एनएसजी का प्रतिबंध हटाना उतना ही साफ-सुथरा और बिना किसी शर्त का है, जितना कि पेश किया जा रहा है?
साफ-सुथरा और बिना किसी शर्त, लगभग एक ही बात है. हमने स्वीकार न की जा सकने वाली किसी शर्त को नहीं माना है, न ही हमारी किसी लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन किया गया है. हमें साफ-सुथरी छूट मिली है. मिसाल के तौर पर हम नहीं चाहते थे कि हम पर कोई ऐसी शर्त लागू हो कि हमें कोई परीक्षण करने की इजाजत नहीं दी जाएगी. हम बार-बार यह कहते रहे हैं कि हम स्वेच्छा से ही परमाणु परीक्षण नहीं करेंगे, हम इसे संधि शर्तों की बाध्यता नहीं बनाना चाहते. एनएसजी ने हमारी स्थिति को मान लिया है. उन्होंने हम पर परमाणु परीक्षण का प्रतिबंध नहीं लगाया लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि उन्होंने हमें ऐसा करने की इजाजत दे दी है. अगर हमें कुछ करने का अधिकार है तो उन्हें प्रतिक्रिया करने का. और हम कुछ करते हैं तो हमें उसके परिणामों को भी भुगतने को तैयार रहना चाहिए.
क्या चीन के रुख से आपको हताशा हुई है?
यदि चीन सर्वसम्मति का हिस्सा न होता तो एनएसजी में सर्वसम्मति होती ही नहीं. यह तो सीधी-सी बात है. आरंभिक दौर में उसकी हरकतें सामान्य निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा थीं.

लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का कहना था कि वे हताश थे.
इस तरह के बयान दिए गए होंगे. मैं जो कह रहा हूं, वह सरकार की नीति है. चीन के विदेश मंत्री ने जो कहा कि काम शब्दों से अधिक बोलते हैं, वह मुझे पसंद आया. और उनके कार्यों ने साबित कर दिया कि वे सर्वसम्मति का हिस्सा थे.

लेकिन अपने देश में तो करार पर अब तक सर्वसम्मति नहीं बन पाई है. भाजपा और वामपंथी, दोनों ही आप पर देश को बेच देने का आरोप लगा रहे हैं.
मैं कह नहीं सकता कि मैंने देश को कितनी बार बेचा है. '80 के दशक में वित्त मंत्री के रूप में मैंने आइएमएफ से पैसा उधार लिया तो विपक्ष का कहना था कि मैंने अपने देश की आर्थिक प्रभुसत्ता बेच दी. '90 के दशक में जब मैंने डब्लूटीओ पर हस्ताक्षर किए तब भी यही आरोप लगा. हाल ही में रक्षा मंत्री के रूप में मुझ पर ऐसे ही आरोप लगे जब मैंने अमेरिका के साथ समझौते के मसौदे पर हस्ताक्षर किए. आखिर एक चीज को कितनी बार बेचा जा सकता है?{mospagebreak}भाजपा का तो कहना है कि हमने परमाणु परीक्षण करने का अपना अधिकार गंवा दिया है. और हमारे रणनीतिक विकल्पों को भी सीमित किया जा रहा है.
उन्हें राष्ट्र को इस बात का स्पष्टीकरण देना है कि उन्होंने 1998 के बाद ऐसा क्यों कहा कि भारत को किसी और परीक्षण की जरूरत नहीं है. क्यों? ऐसा एकतरफा निषेध घोषित करने की वजह? मेरा कहना यह है कि यदि हमें 1998 में परीक्षण का अधिकार था, तो अब भी है. उस समय अपने अधिकार का प्रयोग करने के हमें कुछ परिणाम झेलने पड़े थे. वैसा फिर भी हो सकता है. स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है. कोई समझौता नहीं किया गया है, यह बेबुनियाद आलोचना है.

वामपंथी दल संसद का विशेष सत्र बुलाना चाहते हैं. परमाणु करार पर अमेरिकी कांग्रेस के सदस्य हावर्ड बर्मन के पत्र लीक करने के बाद वे सरकार पर झूठ बोलने का आरोप लगा रहे हैं.
झूठ क्या है? यदि मुझे कुछ पता है और मैंने सच नहीं बोला तो वह तो झूठ है लेकिन इस मामले में अमेरिका की कार्यकारिणी और विधायिका के बीच क्या हुआ उसकी जानकारी मुझे कैसे हो सकती है? हमारा सरोकार तो उसी से है, जिसमें हम शामिल हैं, जैसेकि 123 समझौता और बाकी बातें. सो, इस आरोप का आधार क्या है?

जो नए परमाणु रिएक्टर बनाए जा रहे हैं उनके लिए ईंधन आपूर्ति आश्वासन के क्या मुद्दे उठाए जा रहे हैं?
123 समझौते में जो कुछ प्रावधान हैं, उसी के आधार पर इसका आकलन करना है. जैसाकि मैंने कहा, प्रतिबंध हटाना सिर्फ पासपोर्ट भर है. वीजा तो द्विपक्षीय समझौता होगा, जो हम एनएसजी के उन देशों के साथ करेंगे, जिनके साथ परमाणु व्यापार करना है.

आपने कहा कि भारत दूसरे एनएसजी देशों के साथ परमाणु व्यापार शुरू करने से पहले अमेरिकी करार के पूरा होने का इंतजार करेगा.

मैंने जो कहा था, वह इससे अलग था. मैंने कहा था कि 123 एग्रीमेंट तब तक पूरा नहीं होता जब तक अमेरिकी कांग्रेस इसे मंजूरी नहीं देती. तो हमें इस प्रक्रिया के पूरे होने तक इंतजार करना होगा. तभी हम अमेरिका के साथ परमाणु व्यापार कर सकते हैं. सिद्धांत रूप में तो दूसरे देशों के साथ करार करने से कोई भी नहीं रोक सकता.

तो हम फ्रांस और रूस जैसे दूसरे देशों के साथ समझौता कर सकते हैं?
बेशक हम काम शुरू करने के लिए दूसरे देशों से परमाणु व्यापार कर सकते हैं. और हम जल्द ही ऐसा करना चाहेंगे.{mospagebreak}निजी कंपनियों को परमाणु व्यापार की इजाजत देने के लिए क्या आप घरेलू परमाणु ऊर्जा अधिनियम में संशोधन करेंगे?
अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी. वर्तमान मान्यता तो यह है कि सरकार परमाणु ऊर्जा आयोग के जरिए व्यापार करेगी. अभी मैं कुछ नहीं कह सकता कि आम चुनाव के बाद क्या होगा और नई सरकार कब बनेगी?

हमारे परमाणु हथियार कार्यक्रम का क्या होगा?
परमाणु सिद्धांत की अवधारणा वाजपेयी सरकार ने विकसित की थी और हम उसी पर चल रहे हैं. हम अपने कार्यक्रम को न बढ़ा रहे हैं, न घटा रहे हैं. हमारे पास न्यूनतम विश्वसनीय परमाणु सुरक्षा जरूर होनी चाहिए ताकि हम पर कोई परमाणु हथियारों से हमला न करे क्योंकि उन्हें यह पता होना चाहिए कि हमारा जवाबी हमला उन्हें मान्य नहीं होगा. हम परमाणु हथियारों का जखीरा जमा करने या परमाणु हथियारों की दौड़ में शामिल होने के इच्छुक नहीं हैं.

परमाणु करार पर सर्वसम्मति न बना पाने और वामपंथियों को यूपीए से बाहर जाने से न रोक पाने पर आप निराश हुए थे?
यह मुश्किल था. उनके मतभेद सैद्धांतिक थे. उन्होंने हमसे कहा था कि हम फ्रांस और रूस के साथ तो करार कर सकते हैं लेकिन अमेरिका के साथ नहीं. मैं उनकी सैद्धांतिक अवधारणा नहीं बदल सकता. और एनएसजी की मंजूरी के बिना रूस और फ्रांस के साथ कोई करार संभव नहीं था.

आसिफ जरदारी पाकिस्तान के राष्ट्रपति बन गए हैं तो क्या अब उससे बेहतर संबंध बनाने में मदद मिलेगी?
मैं इस पर नजर रखना पसंद करूंगा क्योंकि कुछ कर दिखाना, कहने से अधिक कारगर होता है. जब नई सरकार बनी तो मैं पाकिस्तान गया था. मैंने उनके साथ बातचीत की तो मौखिक आश्वासनों की कमी नहीं थी. उसके बाद युद्धविराम का उल्लंघन हुआ, घुसपैठ बढ़ी, काबुल में बम धमाके हुए और फिर लच्छेदार बातें हुईं. हमने 1 अक्तूबर से शुरू हो रहे सीमा पार व्यापार पर कुछ ठोस प्रस्ताव भेजे हैं. हमें सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है तो हमें खुशी होगी. ठोस काम शब्दों से कहीं अधिक प्रभावी होता है.

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